जखोली में विदा हुए पांडव ऐतिहासिक ‘खानसौड़’ में हुआ गढ़वाली कमलव्यूह का भव्य मंचन

December 6, 2018 | samvaad365

उत्तराखंड यानी की देवताओं की भूमि इसीलिए इसे कहा जाता है देवभूमि उत्तराखंड क्योंकि यहां पर देवताओं का संबध काफी गहरा रहा है. उत्तराखंड के पहाड़ी आंचल में मान्यताओं का सभ्यता से मेल होता है. और यही मेल यहां की खूबसूरत संस्कृति को जन्म देता है. पांडवों का देवभूमि से संबंध काफी गहरा रहा है. इसीलिए यहां पर पांडव नृत्य के रूप में उनकी पूजा की जाती है. और इस नृत्य में सभी लोग पांडवों की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं.

पांडव नृत्य के लिहाज से केदारघाटी काफी अहम मानी जाती है. रूद्रप्रयाग के कई हिस्सों में पांडव नृत्य का आयोजन किया जाता है. रूद्रप्रयाग के जखोली गांव में भी ऐतिहासिक पांडव नृत्य का आयोजन किया गया. यहां पर काफी समय से पांडव नृत्य होता आ रहा है. और इसकी मान्यता भी काफी ज्यादा है. इस साल भी जखोली में पांडव नृत्य का आयोजन धूमधाम के साथ किया गया. जखोली में परंपरागत तौर तरीकों से बुधवार को पांडवों को विदाई दी गई. अपने ईष्ट देवताओं को धूमधाम से विदा किया गया. जखोली के पांडव नृत्य के समापन के मोके पर भारी संख्या में आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचे और पांडवों का आर्शीवाद लिया.

आपको बता दें पांडव नृत्य से पहले यहां पर पांडवों के जीवनकाल की घटनाओं का भी नाटकीय मंचन किया गया. साथ ही ऐतिहासिक खानसौड़ के मैदान में गढ़वाली कमलव्यूह का भी मंचन किया गया जिसमें भारी संख्या में लोग कमलव्यूह को देखने के लिए पहुंचे. हर एक साल के बाद पांडव नृत्य का आयोजन यहां पर किया जाता है. और इस बार विदाई के साथ अब इंतजार है अगली बार पांडवों के आगमन का।

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उत्तराखंड, रुद्रप्रयाग

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