अपने आप में अलग पहचान रखता है देवभूमि स्थित बूढ़ाकेदार,जानिए क्या है ख़ास इस मंदिर में

December 3, 2018 | samvaad365

उत्तराखंड के टिहरी में स्थित भगवान बूढ़ाकेदार जहां के मेले और यहां का रिवाज आज भी उत्तराखंड को अलग दर्जा दिलवाता है क्योंकि यहां एक ऐसी अनुकंपा है जो सबको हैरान कर देता है। भगवान शंकर की इस भूमि में पीर बाबा का मंदिर होना सबको चौका देता है, और वह भी कोई छोटा नही 180 गांवों का कुल देवता है.

गुरु कैलापीर मेले में ग्रामीण खुशहाली के लिए देवता के पशवा के साथ खेतों में दौड़ लगाते हैं। गुरु कैलापीर देवता टिहरी जनपद के अलावा उत्तरकाशी जिले के 180 गांवों के आराध्य देव हैं। नई टिहरी के भिलंगना प्रखंड के बूढाकेदार गांव में को गुरु कैलापीर देवता मेले के दिन सुबह ग्रामीण ढोल नगाड़ों के साथ मंदिर परिसर में एकत्र होते हैं। इसके बाद देवता की पूजा अर्चना होती है। लोग देवता के पशवा का मंदिर से बाहर आने का इंतजार करते हैं। फिर देवता की झंडी को मंदिर से बाहर निकाला जाता है। पूजारी देवता के पश्वा को लेकर खेतों में जाते हैं। ग्रामीण उनके पीछे-पीछे भागते है जाते हैं। अच्छी फसल व क्षेत्र की खुशहाली के लिए ग्रामीण देवता के पश्वा के साथ खेतों में दौड़ लगाते हैं। अंतिम चक्कर में ग्रामीण देवता पर पुआल चढाते हैं। इसके बाद महिलाएं आशीर्वाद लेने को वहां पहुंचती है। इस दौरान लोग मंदिर में साड़ी चढाते हैं। साथ ही देवता के पश्वा को अपनी समस्या भी बताते हैं।

अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण अलग पहचान रखने वाले टिहरी गढ़वाल के पांचवाधाम कहे जाने वाले बूढ़ाकेदार में भगवान शिव के बूढ़े स्वरूप के दर्शन होते हैं और यहीं पर भगवान शिव के परम उपासक कैलापीर देवता की भी पूजा अर्चना होती है.हर वर्ष कैलापीर देवता का ऐतिहासिक मेला लगता है 500 सालों से चली आ रही इस अनोखी परम्परा के आप भी इस बार साक्षी बनिये। मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में गोरखाओं के साथ हुए युद्ध में गढ़वाल के राजाओं को उनकी हार होती दिखाई दी तो उन्होंने भगवान शिव की पूजा अर्चना की और उनके स्वप्न में भगवान शिव ने गुरू कैलापीर की पूजा अर्चना करने को कहा, जिसके बाद गुरू कैलापीर के आर्शीवाद और मदद से गढ़वाल के राजाओं ने गोरखाओं के साथ युद्ध में विजय हासिल की. हमारे पुर्वजो का कहना है की ये युद्ध दीपावली के समय हुआ था तो क्षेत्रीय लोगों ने दीपावली नहीं मनाई और दीपावली के एक महीने बाद जब राजा विजयी होकर लौटे तब स्थानीय लोगों ने उनके साथ दीपावली का त्यौहार भी मनाया और गुरू कैलापीर देवता को धन्यवाद स्वरूप उनकी नाम पर दो दिन की दीपावली ओर तीन दिन की पूजा अर्चना कर भव्य मेले का आयोजन किया.तीन दिनों तक चलने वाले गुरू कैलापीर देवता के मेले के प्रथम दिन देवता का निशान गर्भग्रह से निकल कर खेतो मै चकर लगया जाता है इस मेले में गुरू कैलापीर के दिव्य त्रिशूल के दर्शन होते हैं और भक्तों का बिड इस त्रिशूल को लेकर दौड़ते है.कहा जाता है कि बूढ़ाकेदार क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति केदारनाथ यात्रा पर नहीं जाता है क्योंकि स्वंय भगवान शिव यहां बूढ़े स्वरूप में विराजमान हैं. कैलापीर देवता भी केदारनाथ नहीं गए और शिव भगवान की यहीं पूजा अर्चना की.श्रद्धालु ढोल नगाड़ों की थाप पर नाचते हुए भक्तजन दूर दराज के करीब 180 गांवों से लोग यहां पहुंचते हैं और कैलापीर देवता से आशीर्वाद लेते हैं.एतिहासिक परम्परा और धार्मिक आस्था के चलते टिहरी गढ़वाल में भगवान शिव और नारायण को कई एसे रूप में पूजा जाता है जो शायद ही कहीं और देखने को मिलतेा हो. तभी तो भगवान शिव के बूढ़े स्वरूप के दर्शन करने और कैलापीर देवता का आर्शीवाद लेने दूर दराज से भक्त लाखों की संख्या में यहां पहुंचते हैं।  इस वर्ष श्री बूढाकेदार नाथ एवं श्री गुरु कैलापीर दीपावली (बग्वाल) महोत्सव 6 – 7 दिसंबर को है तथा बलिराज तीन दिवसीय मेला 8 – 9 – 10 दिसंबर को है.

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संध्या सेमवाल

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