VIDEO: ‘अरविंद सिंह रावत’ ने प्रोफेसर होने के बाद भी बरकरार रखा लोकगीतों के प्रति अपना जुनून

December 2, 2018 | samvaad365

जहां एक तरफ आजकल लगभग सभी गायक एवं गीतकार पुराने गीतों को अपने नए गढ़वाली गीतों से संस्कृति समाज को गति देते हैं और हर वर्ग को एक साथ बांधते हैं। संस्कृति से संस्कार, संस्कार से व्यवहार है और व्यवहार से समाज में सुख, समृद्धि जन्म लेती है।”लोक” को अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति में चित्रित कर पाना और संस्कृति संवर्धन यज्ञ में आहुति दे पाने का पुण्य बहुत कम कलाकारों को हासिल हो पाता है। उत्तराखंड के ऐसे ही एक कलाकार है, अरविन्द सिंह रावत।

 

अरविंद का जन्म सन् 1987 में टिहरी गढ़वाल के चामियाल क्षेत्र के कोठगा गांव में हुआ था। बचपन की शिक्षा गांव में ही हुई और फिर अरविंद पिताजी के साथ पौड़ी आ गए। राजकीय इंटर कॉलेज पौड़ी से अरविंद ने हाई स्कूल और इंटर की परीक्षा विज्ञान वर्ग में प्रथम श्रेणी में पास की और स्कूल के टॉपर भी रहें। चूंकि अरविन्द पढ़ाई में भी अव्वलथे पिताजी चाहते थे कि वो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करें सो वो इंजीनियरिंग की अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए तैयारी में जुट गए और परीक्षा पास कर उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग संकाय में बी.टेक में दाखिला लिया। बी.टेक के उपरांत अरविंद ने उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रॉनिक्स में एम.टेक किया। आज अरविंद उत्तराचंल विश्वद्यालय में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत हैं।

 

बतौर प्रोफेसर अरविंद इलेक्ट्रॉनिक्स में शोध भी कर रहें है और अभी तक नेश्नल एवं इंटरनेशनल लेवल पर दर्जन भर शोध पत्र लिख चुके हैं। अरविंद ने इंजीनियरिंग के साथ साथ अपने गढ़वाली गीतों के लेखन और गायन को नहीं छोड़ा और नए गीतों के लेखन के द्वारा उत्तराखंडी लोकसंगीत को एक नयी पहचान दिलाने में वो आज भी लगातार प्रयासरत हैं। लेखन और गायन कला को आगे बढ़ाते हुए उनकी पहली एलबम साथ माय को” 2015 में रिलीज़ हुई और इनकी एलबम पूरे भारतवर्ष में क्षेत्रीय भाषाओं में सर्वाधिक सुनी जाने वाली पहली एलबम बनी। ये हर उत्तराखंडी के लिए गर्व का विषय था। संगीत एल्बम “साथ माया को” जिसमें कुल आठ गाने लिखे और गाये भी, पूरे उत्तराखंड में अपना एक सशक्त स्थान बनाने में सफल रही है। इसके बाद अरविंद की साल 2018 में 8 गीतों की गीतमाला सिलेबाना”आयी जिसके गीतों को अरविंद धीरे धीरे यूट्यूब पर रिलीज़ करेंगे। अरविन्द बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें संगीत में बड़ी रूचि थी। वह इलेक्टौनिक्स इंजीनियरिंग में बी.टेक,एम.टेक और पीएचडी करने के साथ ही अपनी संगीत कला और लेखन को और अधिक निखारने में निरंतर लगे हैं। लोकसंगीत को पहचान दिलाने के लिए वो पूर्णतः समर्पित है। अरविन्द के गीतों में उत्तराखंड के गाँव, वहां की दिनचर्या, संस्कारों की झलक मिलती है।

उत्तराखंड में जहाँ आज गढ़रत्न श्री नरेन्द्र सिंह नेगी और अन्य पुरोधाओं केलिखे और गाये गए गीतों को युवा कलाकार पुनः गाकर जगह बनाने की जुगत में लग रहे है वहीँ अरविन्द स्वयं गीतों का लेखन, संगीत संयोजन में काफी समय व्यतीत कर रहे है। अरविंद के गीतों और उनकी लेखनी को लोग इसलिए भी पसंद करते हैक्योंकि वो खुद अपने गीतों की रचना स्वयं करते है। उन्होंने आजतक किस भी दूसरे गीत या पुराने गीत को नहीं गाया है। उनका मानना है कि पहाड़ी लोकसंगीत में अभी बहुत कुछ है जिस पर प्रयोग किया जा सकता है। लोक भाषा और लोक संस्कृति के लिए उनके द्वारा किया जा रहा यह सुंदर प्रयास काबिल-ए-तारीफ है। आशा है, अरविन्द के गीत उत्तराखंडी लोकभाषा और लोकसंगीत को उसके उत्कर्ष तक पहुचाएंगे।

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देहरादून/काजल

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