टेंशन के वो 12 दिन… जब दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर आ गई थी… वो भी एक परमाणु युद्ध

January 16, 2020 | samvaad365

युद्ध कहीं भी हो… किसी के भी बीच हो… परिणाम सभी के लिए घातक हो जाते हैं…. आज के समय दो देशों के बीच का युद्ध अगर विश्व युद्ध में तब्दील हो जाए… तो उसके परिणाम कैसे होंगे आप खुद कल्पना कर सकते हैं… क्योंकि आज दुनिया के कई देश परमाणु शक्ति संपन्न देश हो चुके हैं… अतः युद्ध की कामना न कीजिए विश्व शांति की कामना कीजिए… क्यूबा मिसाइल क्राइसिस की इस स्टोरी को आपके सामने रखने का मकसद ही यह है कि आपक जानकारी तो बढ़ाएं ही साथ ही मंथन करें उस संकट पर और आज के विश्व पर… स्टोरी की रोचकता अपनी जगह है…

ये दुनिया के इतिहास की वो कहानी है जिसने करीब 12 दिनों तक दुनिया की सांसे थमा दी थी, हर कोई इस बात से डर रहा था कि कहीं ये तीसरा विश्व युद्ध तो नहीं ये युद्ध अगर होता तो साधारण नहीं होता यह एक परमाणु युद्ध की तैयारी थी… क्योंकि ये था क्यूबा मिसाइल संकट… जिसे इतिहास क्यूबन मिसाइल क्राइसिस के नाम से जाना जाता है….

युद्ध की शंका बहुत टेंशन दे ती है तब भी, आज भी

ईरान और अमेरिका के बीच हाल में चल रहे टकराव से एक पल के लिए सभी युद्ध की कल्पना करने लगे थे, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के बाद इन अटकलों पर फिलहाल के लिए तो विराम ही लग गया है, लेकिन इतिहास में एक घटना ऐसी भी रही जिसने पूरी दुनिया का टेंशन में डाल दिया था, वो था क्यूबा का मिसाइल संकट. इस वक्त दुनिया एक परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी थी. इस युद्ध का मतलब था सबकुछ तबाह हो जाना.

इस कहानी के कैरेक्टर को जानिए

इस संकट के तीन कैरेक्टर हैं जो कि देश के रूप में हैं और फिर उन देशों के कुछ नेता हैं, पहले देश को जानिए अमेरिका, यूएसएसआर Union of Soviet Socialist Republics (USSR) यानी कि सोवियत संघ जो कि आज रूस है, और अमेरिका के पास का ही एक छोटा सा लेकिन महत्वपूर्ण देश क्यूबा.  इन देशों के वह नाम हैं जिन्हें आपको सबसे पहले जानना चाहिए पहले हैं उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जाॅन एफ कैनेडी, दूसरे यूएसएसआर के प्रधानमंत्री निकिता ख्रुशेफ, और दो नाम क्यूबा के थे वहां के प्रधानमंत्री फिडल कास्ट्रो, और टाॅप लीडर चे ग्वारा ये चे ग्वारा वही हैं जिन्हें आपने कई टीशर्ट पर भी देखा होगा.

तकरार US और USSR की थी

1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया था, उसके बाद एक लंबा समय शीत युद्ध में बीता इसके दो बड़े नायक तब भी थे आज भी हैं. अमेरिका यानी कि यूएसए और सोवियत संघ यानी कि यूएसएसआर दुनिया के नक्शे पर देखें तो अमेरिका के बहुत ही करीब में क्यूबा है जो कि यूएसएसआर से काफी दूर था, लेकिन क्यूबा को समर्थन देने वाला यूएसएसआर ही था, साल 1953 से 1959 तक क्यूबन रेवोल्यूशन चला यानी कि क्रांति इस क्रांति के नायक थे फिडल कास्ट्रो और चे ग्वारा जिन्होंने क्यूबा में कम्यूनिज्म कायम किया, दिक्कत यह थी कि अमेरिका कम्यूनिज्म का विरोधी था इसलिए क्यूबा पर नियंत्रण चाहता था कई बार क्यूबा पर हमले करने की कोशिश की कम्यूनिज्म को हटाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाया, वहीं कम्यूनिज्म समर्थक यूएसएसआर क्यूबा को हर समय मदद कर रहा था, दोनों महाशक्तियों का संघर्ष क्यूबा तक ही सीमित नहीं था बल्कि बाहर भी संघर्ष था, जर्मनी के दोनों हिस्सों के बीच बर्लिन की दीवार एक उदाहरण है, इसी तनातनी के बीच साल 1962 में ये संकट पैदा हो गया.

क्या था मिसाइल संकट ?

लगातार चल रही तनातनी के बीच यूएसएसआर के प्रधानमंत्री निकिता ख्रोशेफ को लगा कि अमेरिका को नियंत्रण में करने के लिए कुछ बड़े कदम उठाने का वक्त आ गया है, क्योंकि क्यूबा पर अमेरिका भी लगातार आंख लगाए बैठा था, अगर क्यूबा पर अमेरिका हमला कर दे तो यूएसएसआर दूरी के चलते मदद करने में काफी देर भी कर देता दोनों देशों की दूरी को आप नक्शे में देख सकते हैं, इसके अलावा पिग्स आक्रमण, ईस्ट और वेस्ट जर्मनी, टर्की और इटली में अमेरिका की मिसाइल तैनाती भी इस संकट का बड़ा कारण बनी, यही सब देखते हुए. यूएसएसआर ने फैसला लिया कि वह क्यूबा में मिसाइल तैनात कर दे ताकि अमेरिका से युद्ध की स्थिति में निपटा जा सके, लेकिन शीत युद्ध के दौर में ये काफी मुश्किल भी था, क्योंकि तब तक दुनिया परमाणु हथियारों को डेवलप कर चुकी थी. इसी दौर में अमेरिका की भी यह सोच थी कि क्यूबा का चैप्टर अब एक ही बार में क्लोज किया जाए. इसलिए यूएसएसआर ने क्यूबा में मिसाइल तैनाती शुरू कर दी लेकिन ये सब गुपचुप तरीके से चलता रहा.

अमेरिका को पता चला तो युद्ध की आहट आ गई!

ये अगस्त साल 1962 का समय था…. क्यूबा पर निगरानी रखने के लिए अमेरिका ने हवाई जहाजों को तैनात किया हुआ था, अगस्त में अमेरिका को इसकी भनक लग गई, लेकिन जानकारी पुख्ता नहीं हो पाई, आखिरकार 14 अक्टूबर 1962 को अमेरिका ने क्यूबा में तैनात मिसाइलों की लोकेशन पता लगा ली, उनके मुताबिक 9 जगहों पर आर 12 और आर 14 मीडियम रेंज बैलेस्टिक मिसाइलों की तैनाती थी. जैसे ही अमेरिका को पुख्ता हुआ वैसे ही संकट शुरू हो गया फिर 16 अक्टूबर से क्यूबा का ये मिसाइल संकट पैदा हो गया. अमेरिका के सामने रास्ते थे कि या तो बात चीत से मामला हल हो या फिर हमला किया जाए.. लेकिन हमले में खतरा काफी ज्यादा था क्योंकि फिर ये हमला विश्व युद्ध में बदल जाता. वहीं दूसरी और यूएसएसआर आखिरी समय तक ये मानने को तैयार नही था कि उन्होंने मिसाईल तैनात की हैं.

संकट के दौरान क्या क्या हुआ ?

16 अक्टूबर 1962 संकट शुरू

16 अक्टूबर को ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने एम्स काॅम कमेटी बनाई ताकि वह इस मामले पर  राष्ट्रपति को परामर्श दे सके. 16 को ही बैठक भी हुई.

18 अक्टूबर 1962

इसके बाद 18 अक्टूबर 1962 को राॅबर्ट कैनेडी जो कि अटाॅर्नी जनरल थे उन्होंने सोविय के विदेश मंत्री आंद्रेज ग्रोम्योको से मुलाकात की, लेकिन विदेश मंत्री न्यूक्लियर हथियार की बात मानने को तैयार ही नहीं हुए.

19 अक्टूबर 1962

19 अक्टूबर धीरे धीरे ये संकट गहराने  लगा और युद्ध की ओर जाने लगा एक्स काॅम ने सलाह दी कि ब्लाॅकेड लगा दिया जाए यानी कि यूएसएसआर को ब्लाॅक कर दें रोक दे उनके जहाज क्यूबा न आने पाए, जानकारों के मुताबिक इसे भी एक्ट आॅफ वार माना जाता है.  लगातार इस दौरान बात चीत भी चलती रही दिन रात डिप्लोमेट इस मामले मे लगे रहे.

20 अक्टूबर 1962

20 तारीख को अटाॅर्नी जनरल कैनेडी कई सिफारिशें देते हैं,

22 अक्टूबर 1962

इसके बाद 22 अक्टूबर को प्रेजिडेंट एक ऐतिहासिक भाषण देते हैं जिसमें यूएसएसआर को जमकर खरी खोटी सुनाई जाती है. इस भाषण पर सभी की नजरें थी.

23 अक्टूबर 1962

23 अक्टूबर को सोवियत के जहाज रोके गए 750 मील दूर क्यूबा से, इस दौरान यूएन से भी दबाव बनाने की कोशिश होती है क्यूबा पर अमेरिका डबल निगरानी रखता है, इसी बीच अमेरिका फैसला करता है कि अब क्यूबा पर आक्रमण किया जाए क्योंकि बात बन नहीं रही थी. इसी बीच क्यूबा के फिडल कास्ट्रो यह चाहते थे कि यूएसएसआर हमला कर दे भले ही क्यूबा नक्शे से मिट जाए लेकिन दुनिया में अमेरिका के खिलाफ क्रांति आ जाएगी, लेकिन निकिता भी इस बात को समझते थे कि ये आसान नहीं है, हालांकि दो दिन बाद प्रेजिडेंट कैनेडी कहते हैं कि हम हमला नहीं करेंगे, क्योंकि इसी दौरान निकिता कंडीशन रखते हैं अमेरिका के सामने अगर अमेरिका क्यूबा पर हमला न करे और टर्की, इटली से भी अपनी मिसाइल हटा ले तो यूएसएसआर भी क्यूबा से मिसाइल हटा लेगा, पहली शर्त को मान लिया गया लेकिन टर्की और इटली से मिसाइल हटाने पर अमेरिका राजी नहीं था, हालांकि इस ममाले में जानकार कहते हैं कि बाद में वहां से भी मिसाइलें अमेरिका ने हटा दी थी. और इसी के साथ ही 28 अक्टूबर को इस संकंट का एक सुखद अंत हो जाता है. लेकिन यूएस और यूएसएसआर के बीच तकरार इसके बाद भी जारी रही.

दुनिया दो भागों में बंट चुकी थी

साल 1962 के दौरान इस संकट में धीरे धीरे दुनिया भी दो भागों में हो चुकी थी, कम्यूनिज्म समर्थित देश यूएसएसआर के साथ खड़े थे जिसमें चाइना भी शामिल था तो वहीं डेमेक्रेट देश अमेरिका के साथ थे, हर कोई गुटों में बंटता जा रहा था, यानी कि अगर ये युद्ध वाकई में होता तो शायद आज की दुनिया ऐसी न होती क्योंकि ये परमाणु युद्ध होता.

उस दौरान भारत

साल 1962 के दौर में भारत भी एक युद्ध लड़ रहा था ये चीन के साथ भारत का युद्ध था, लेकिन भारत यूएस और यूएसएसआर की इस जंग में खुद को गुटनिरपेक्ष घोषित कर चुका था इसलिए न तो अमेरिका ने न ही यूएसएसआर ने चीन के साथ युद्ध में भारत की मदद की ये भारत का ऐतिहासिक कदम भी था.

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