टिहरी जनपद के सुमाड़ी गांव में आजादी के 71 साल बाद पहुंची बिजली

December 3, 2018 | samvaad365

आज भले ही 21वीं सदी का भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया हो आज भले ही भारत अपने आजादी के 71 साल में ही डिजीटल इंडिया बन गया हो, लेकिन देश के कुछ गांव आज भी आदिम युग के भारत में ही जी रहे हैं, विकास बाट जोह रहे एक ऐसे ही गांव मे जब बिजली पहुंची तो ग्रामीणों को मानो नई जिन्दगी मिल गई। टिहरी जिले की देवप्रयाग विधानसभा का सुमाड़ी गांव सदियों से सड़क व बिजली से वचिंत था।

गांव में जिस ग्रामीण की आर्थिक स्थिति अच्छी थी वह गांव छोड़कर चला गया लेकिन आज भी दो दर्जन परिवार इसी गांव में विकास की बाज जोह रहे थे, लेकिन शनिवार को जब गांव में पहली बार बिजली पहुंची तो ग्रामीणों में एक अलग उत्साह दिखा। आज भी गांव तक सड़क नहीं पहुंच पाई है वहीं ग्रामीण  लैम्प से सौर उर्जा के छोटे मोटे उपकरणों से काम चला रहे थे। शुक्र तो इस बात का है कि दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना इस गांव के लिए ज्योति का नया पुंज बनकर उभरी है और बिजली आने से ग्रामीणों मे खासा उत्साह है हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि गांव में मुलभूत सुविधाओं का टोटा है, न ही गांव तक सडक पहुंच पाई है न ही बच्चों के पढ़ने के लिए आज तक कोई आंगनबाडी है जिसके चलते उन्हें कई किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है।

दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना से सुमाड़ी गांव जगमगा चुका है लेकिन देवप्रयाग क्षेत्र में आज भी कई गांव बिजली के बिना जीवन-यापन कर रहे हैं। हालांकि विद्युत विभाग का कहना है कि ऐसे गांवों का विद्युतीकरण किया जा रहा है । और इसी योजना के तहत देवप्रयाग विधानसभा के कीर्तिनगर, देवप्रयाग, जाखणीधार के बिजली से वंचित गांवों को 8 करोड की लागत से रोशन किया जायेगा। वहीं देवप्रयाग विधायक विनोद कंडारी ने बताया कि जब वे चुनाव के समय विद्युत विहीन गांव में गये थे तो उन्होंने ग्रामिणों से गांव तक बिजली व सड़क पहुंचाने का वादा किया था, जिस पर निरन्तर काम चल रहा है और सुमाड़ी गांव इसी का उदाहरण है।

बहरहाल सुमाड़ी गांव में भले ही बिजली पहुंचने का जश्न है लेकिन हमारी हुकमरानों और हमारे सिस्टम के लिए ये कोई अच्छी खबर नहीं है, खासतौर पर ऐसे उतराखंड जैसे राज्य में जहां पहाड़ों से चिकित्सा, शिक्षा,सड़क पेयजल जैसी मूलभूत आवश्यकता के कारण हो रहे पलायन की चिन्ता सरकार की सबसे बड़ी चिन्ता है।

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श्रीनगर, गढ़वाल/कमल किशोर पिमोली

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