देवभूमि में इसलिए किया जाता है पाण्डव नृत्य का आयोजन…

December 7, 2018 | samvaad365

देश में उत्तराखण्ड एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहां रामलीलाओं के साथ ही पाण्डव नृत्य के आयोजनों की युगों पुरानी परम्परा है, पहाड़ों में पाण्डव नृत्य का आयोजन मात्र मनोरंजन के लिए नहीं होता बल्कि मान्यता है कि पहाड़वासी अपने पूर्वजों द्वारा पाण्डवों को दिया हुआ वचन निभा रहे हैं वहीं पाण्डव भी पहाडवासियों के पूर्वजों को दिए अपने वचन निभाने आज भी पाण्डव नृत्य में आते है,

उत्तराखंड को पांडवों की धरती भी कहा जाता है, मान्यता है कि पांडव यहीं से स्वार्गारोहणी के लिए गए थे, इसी कारण उत्तराखंड में पांडव नृत्य की विशेष व अनोखी परंपरा है, महाभारत के युद्ध में विजय होने के बाद पाण्डव स्वर्गारोहणी के लिए जब निकले तो उस समय में गंगा, भागीरथी, अलकनंदा व मंदाकिनी नदी किनारे से होकर स्वर्गारोहणी तक गए, जहां-जहां से पांडव गुजरे, उन गावों में पाण्ड़व ठहरे ग्रामीणों को धर्म-अधर्म के बीच हुए महाभारत के महायुद्ध में धर्म की विजयगाथा सुनाई और ग्रामीणों से वचन लिया कि धर्म की इस विजयगाथा का वो युगों-युगों तक प्रचार-प्रसार करते रहें, मान्यता है कि पाण्डवों द्वारा प्रतिकात्मक रूप से अपने अस्त्र-शस्त्र भी हर गांव के ग्रामीणों को दिए गये थे जो कि आज भी ग्रामीणों द्वारा पूजे जाते हैं।

प्राचीनकाल से ही पहाड़ के गांवों में चली आ रही पाण्डव नृत्य की परम्परा मात्र मनोरंजन नही बल्कि पाण्डवों के प्रति पहाड़वासियों की गहरी आस्था का प्रमाण है, हर वर्ष नवंबर से लेकर फरवरी तक पहाड़ के गावों में पाण्डव नृत्य के आयोजन की एक प्राचीन परम्परा है, पहाड़ खासकर गढ़वाल के हर गांव में 3वर्ष, 5 वर्ष व 7 वर्ष के अन्तराल में एक बार पाण्डव नृत्य का आयोजन धार्मिक दृष्टि व पाण्डवों से पूर्वजों के वचन के लिए आवश्यक माना जाता है, मान्यता यह है कि ऐसा न करने पर पाण्डवों की आत्माऐं ग्रामीणों से नाराज हो जाती है और ग्रामीणों पर पाण्डवों का दोष लगता है, आज भी ग्रामीणों का मानना है कि पूर्वजों के वचनानुसार पाण्डव नृत्य का आयोजन न करने पर उनके गावं के सारे पशुओं पर खुरियां रोग हो जाता है।

ऐसा नही है कि पाण्डवों का ग्रामीणों के पूर्वजों को दिया पाण्डव नृत्य का वचन एकतरफा था, पाण्डवों ने ये भी वचन दिया था कि जब धर्म-अर्धम के युद्ध पर आधारित पाण्डव नृत्य का आयोजन ग्रामीणों द्वारा किया जायेगा तो स्वयं पाण्डव उसमें उपस्थित होकर ग्रामीणों को सदैव आर्शीवाद देंगे, मान्यता है कि पाण्डवों की आत्माऐं आज भी ग्रामीणों द्वारा निर्धारित पश्वाओं पर अवतरित होकर अपना आर्शीवाद देती हैं,

धार्मिक इतिहास के अनुसार भी पाण्डवों ने उत्तराखण्ड के पहाड़ो में अपने जीवन के कई वर्ष गुजारे, महाभारत के युद्ध से पहले पांडवों को वनवास की सजा दी गई, उस वक्त उन्होंने अपनी यह सजा उत्तराखंड के जंगलों में ही काटी थी और उत्तराखंड के जौनसार इलाके के राजा विराट ने उन्हें अपने इलाके में शरण दी थी, इस कारण जौनसार के लोग आज भी पांडवों की उपासना करते है यही नहीं लम्बे समय तक अपने जीवनकाल में दूवभूमि में रहने के दौरान पाण्डवों ने हिंदुओं के प्रमुख तीर्थ स्थल बद्रीनाथ, केदारनाथ, बुढ़ाकेदार व पंच केदार के अंश तुंगनाथ, मध्यमेश्वर, रूद्रनाथ व कल्पेश्वर जैसे मंदिरो का निर्माण भी पांडवों ने ही किया है, यही कारण है कि लोगों में पाण्डवों का देवभूमि प्रेम के कारण लोग आज भी पाण्डवों को अपने बीच पाते हैं।

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रुद्रप्रयाग/कुलदीप राणा

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