पिथौरागढ़ में आज भी जीवित है मध्ययुगीन मानसिकता, महावारी में छात्राओं के स्कूल जाने पर है रोक

December 1, 2018 | samvaad365

21 वीं सदी के इस दौर में जहां मानव सभ्यता चांद और मंगल में अपने झंडे लगा चुकी है। वहीं कई इलाके ऐसे भी है जहां समाज आज भी मध्ययुगीन मानसिकता में जकड़ा हुआ है। हम बात कर रहे है पिथौरागढ़ के नेपाल सीमा से सटे सेल क्षेत्र की। जहां लोग अंधविश्वास में इस कदर जकड़े हुए है कि यहां महावारी के दौरान छात्राओं को स्कूल जाने की मनाही है। जिस कारण छात्राओं की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

एक तरफ जहां मानव सभ्यता मंगल में आशियाना बनाने की फिराक में है। वहीं आज भी कई इलाके ऐसे है जो मध्ययुगीन मान्यताओं को ढ़ोये जा रहे है। नेपाल सीमा से सटे दुर्गम क्षेत्र सेल की बात करें तो यहां छात्राओं को पीरियड्स के दौरान स्कूल जाने पर प्रतिबंध है। दरअसल स्कूल जाने वाले रास्ते में लोक देवताओं के मंदिर है जहां मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर के आस पास से गुजरने की मनाही है। जिस कारण मासिक धर्म के दौरान चार दिनों तक स्कूली छात्राओं को अभिभावकों द्वारा स्कूल नहीं भेजा जाता। अब इसे आस्था कहें या अंधविश्वास मगर इस जड़वादी मानसिकता के चलते यहां लड़कियों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

सरकार ने चार साल पहले ही सेल में इंटर कॉलेज को स्वीकृति दी थी। इस इंटर कॉलेज में दूर-दराज के इलाकों से 100 के करीब छात्राएं अपना भविष्य संवारने आतीं हैं। मगर महावारी के दौरान छात्राएं स्कूल नहीं जा पाती। पीरियड्स के दौरान छात्राओं को अपनी पढ़ाई छोड़ने को मजबूर होना पड़ता है। दरअसल सेल इंटर कॉलेज को जाने वाले रास्ते में तीन मंदिर ऐसे है जहां महावारी के दौरान छात्राओं का प्रवेश वर्जित है। हालात इस कदर बद्तर हैं कि अगर किसी मजबूरी में पीरियड के दौरान छात्राओं को स्कूल आना ही हुआ तो, वे काफी लम्बे रास्ते से होकर यहां पहुंचती हैं। यही नहीं इस दौरान वे क्लास रूम में भी नहीं जातीं हैं। इलाके में इंटर कॉलेज खुलने के बाद शिक्षकों ने हालात को बदलने की कोशिश भी की, लेकिन अंधविश्वास की जड़े इतनी गहरी हैं जिन्हे हिला पाना अध्यापकों के बस में नही है।

वहीं इस मामले में जब अधिकारियों से बातचीत की गयी तो उन्होंने जल्द ही इसकी जांच करने और ग्रामीणों की काउंसिलिंग करने की बात कही है। वक्त के साथ-साथ कई धारणाएं बदली हैं, लोगों की सोच और जीने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। मगर महिलाओं की इस प्राकृतिक प्रक्रिया को लेकर अभी भी सोच में काफी बदलाव लाने की जरूरत है। सबरीमाला मंदिर हो या फिर सेल क्षेत्र के ये मंदिर आज भी ये दर्शाते है कि स्त्रियों को भारतीय समाज में समान अधिकार नहीं मिल पाया है।

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पिथौरागढ़/मनोज चंद

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