आप भी लीजिए ‘नेहा टी स्टाल’ की चाय की चुस्कियां,जानें क्या कुछ है ख़ास

December 30, 2018 | samvaad365

उत्तराखंड के रुद्रपुर की नेहा मखीजा ऐसा कुछ कर रही है कि हर कोई उसे सलाम कर रहा है. एमबीए की पढ़ाई के साथ-साथ रुद्रपुर रेलवे स्टेशन के समीप छोटी की चाय की दुकान चला रही है। यही नहीं एमबीए पास करने के बाद कई जगह नौकरी भी की। आखिर में अहमियत अपनी ही चाय की दुकान को दी। नेहा कहती हैं, यह भी तो अपने पैरों पर खड़ा होना ही है।

18 वर्ष पूर्व जब पिता का साया सिर से उठा, तब सात साल की ही थी। मां ने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए कपड़ों की सिलाई का काम शुरू किया।  नेहा बड़ी हुई तो उसने खुद पैरों पर खड़े होने और मां का सहारा बनने के लिए कदम बढ़ाए।

नेहा, पिता राजेंद्र कुमार की साल 2000 में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मां सरोज पर तीन बेटियों की परवरिश का जिम्मा आ गया। बड़ी बहन सारिका व सबसे छोटी गार्गी भी मां को सहारा देने लायक नहीं थी। इसी बीच मां ने घर के सामने ही बाउंड्री से सटाकर चाय की दुकान खोल ली। यहां वह कपड़ों की सिलाई का काम भी ले लेती थी। फिर मैंने स्कूल की पढ़ाई के दौरान कुछ समय दुकान में बैठकर मां का हाथ बंटाना शुरू किया।

नेहा ने बताया कि पिता की मौत के बाद मां ने दूसरा विवाह किया। परिवार की हालत फिर भी नहीं बदली। क्योंकि सौतेले पिता 24 घंटे सत्संग में ही मगन रहते थे। नेहा कहती हैं कि बिजनेस छोटा हो या बड़ा, यह खुद का हो तो एक अलग ही संतोष मिलता है। एमबीए करने के बाद भी चाय की दुकान चलाने की बात पर बोलीं, मुझे कोई मलाल या अफसोस नहीं है। काम वही करना चाहिए, जिसमें आत्मसंतुष्टि हो। हां, उस काम को आपको और बेहतर तरीके से करने की ललक होनी चाहिए। मेरा लक्ष्य है चाय की दुकान से बड़े व्यवसाय की ओर बढ़ना।

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देहरादून/संध्या सेमवाल

 

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